क्या आप जानते हैं कि 1999 में हुए करगिल युद्ध ने हमारी सीमाओं की समझ ही बदल दी? यह कोई पारंपरिक युद्ध नहीं था—ऊँचे हिमालयी चोटियों पर तेज लड़ाई और तिहरा दबाव था: ठंडी, कमी और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियाँ। उस समय दुश्मन ने लाइन ऑफ कंट्रोल के पार कई ऊँची चोटियों पर कब्जा कर लिया था, जिससे श्रीनगर–लेह राजमार्ग की सुरक्षा पर सीधे खतरा बन गया।
मई 1999 के आसपास भारतीय सुरक्षा बलों ने अलर्ट जाना और जल्द ही ऑपरेशन विजय शुरू हुआ। जमीन पर इन्फैंट्री, आर्टिलरी और स्पेशल फोर्सेज ने मिलकर कठिन परिस्थितियों में हमले किए। वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर के तहत बमबारी और स्थायी समर्थन दिया। टाइगर हिल, टोलींग जैसी रणनीतिक चोटियों की वापसी सबसे अहम रही। जवानों ने ऊँचाई पर चढ़ाई कर सीधे दुश्मन ठिकानों को टारगेट किया—यह आसान नहीं था, लेकिन सामूहिक कोशिश ने मोर्चा पलट दिया।
लड़ाई मई से जुलाई 1999 तक चली। अंतरराष्ट्रीय दबाव और मोर्चे पर चढ़ते हुए नुकसान के बाद विरोधी ताकतों को पीछे हटना पड़ा। भारत ने कई बहादुर जवानों को खोया—करीब 500 से ज्यादा शहीद बताए जाते हैं—और कई घायल हुए। इस युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा और नायब सूबेदार योगेंद्र यादव जैसे जवानों की शहादत आज भी देश में याद की जाती है।
करगिल युद्ध ने साफ दिखाया कि ऊँचे क्षेत्र में व्यक्ति, जानकारी और संसाधन कितना फर्क डालते हैं। पहली बात, गश्ती और इंटेलिजेंस में सुधार की जरूरत सामने आई। दूसरी, आर्मी-आईएएफ-नेवी के बीच समन्वय और आधुनिक सर्विलांस की अहमियत बढ़ी। तीसरी, कूटनीति ने भी भूमिका निभाई—अंतरराष्ट्रीय समर्थन ने दबाव बढ़ाया और समस्या के शांतिपूर्ण समाधान में मदद की।
हर साल 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन जवानों को याद करने का मौका है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में देश की हिफाज़त की। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं तो करगिल की कहानियाँ न सिर्फ युद्ध-कथा हैं, बल्कि सैनिक साहस, तਕनीकी बदलाव और सामरिक सोच के बड़े सबक भी देती हैं।
अगर आप और पढ़ना चाहते हैं—हमारे आर्टिकल्स में करगिल के अलग-अलग पहलू मिलेंगे: युद्ध के दिन‑प्रतिदिन घटनाक्रम, सैनिकों की व्यक्तिगत कहानियाँ और ऑपरेशनल टेक्निक्स। ये मदद करेंगे समझने में कि कैसे एक छोटी सी चोटी का काबिज होना बड़े खतरों को जन्म दे सकता है और कैसे तैयारी उसे रोकर सकती है।