चाचा नेहरू यानी जवाहरलाल नेहरू—भारत के पहले प्रधानमंत्री और बच्चों के प्रिय नेता। आप उन्हें बच्चों के दिन के रूप में भी जानते होंगे। पर नेहरू सिर्फ एक राजनेता ही नहीं थे; उन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखने में बड़ा योगदान दिया। यहाँ आसान भाषा में उनकी प्रमुख बातों और रोजमर्रा में उनके विचार कैसे काम आते हैं, बताता हूँ।
नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद उन्होंने औद्योगिकीकरण, विज्ञान और शिक्षा पर जोर दिया। उनके समय में भारतीय आर्थिक योजनाएँ और पहली पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू हुईं। IIT, AIIMS जैसे संस्थान और वैज्ञानिक संस्थानों की नींव ने देश की तकनीकी बुद्धि को बढ़ाया। नेहरू ने 'वैज्ञानिक मानसिकता' और 'नवोन्मेष' को बढ़ावा दिया—ये आज भी हमारे शिक्षा और नीति निर्माण में काम आते हैं।
हम रोज़मर्रा की बातें लें—किसी स्कूल में विज्ञान क्लब शुरू करना हो या स्थानीय पुस्तकालय में बच्चों के लिए विज्ञान गतिविधि आयोजित करना—यह नेहरू के विचारों का सीधा असर है। सरकारी और निजी स्तर पर शिक्षा और शोध को प्राथमिकता देना उनकी विरासत का हिस्सा रहा।
नेहरू बच्चों से बहुत प्यार करते थे। उनका जन्मदिन (14 नवम्बर) अब बच्चों का दिन मनाया जाता है। उन्होंने बच्चों की शिक्षा, खेल और संस्कृति को महत्व दिया। आप घर पर भी नेहरू के विचारों को लागू कर सकते हैं—बच्चों को सवाल पूछने दें, प्रयोग करने दें और उन्हें किताबों से जोड़ें। सरल गतिविधियाँ जैसे घर में छोटा विज्ञान प्रदर्शन, स्थानीय म्यूज़ियम की यात्रा या कहानी पढ़ने की शाम नेहरू की सोच के अनुरूप हैं।
अगर आप बच्चों को नेहरू से जोड़ना चाहते हैं तो ये आसान कदम अपनाएँ: नेहरू पर बच्चों की उम्र के अनुसार किताबें चुनें; 14 नवम्बर पर विषयगत कार्यक्रम करें; स्कूल या घर में 'विचार-विनिमय' सत्र रखें जहाँ बच्चे सवाल पूछें। इन तरीकों से विचार सिर्फ जानकारी नहीं रहते बल्कि व्यवहार बन जाते हैं।
अगर आप "चाचा नेहरू" टैग से यहाँ आए हैं तो आप हमारे साइट पर नेहरू से जुड़े लेख, इतिहास, नीतियों पर विश्लेषण और बच्चों से जुड़ी कवरेज देख पाएँगे। ध्यान रहे कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझते समय उनके सकारात्मक और आलोचनात्मक पहलू दोनों पर नज़र डालें—यही संतुलित दृष्टिकोण है।
चाहे आप छात्र हों, शिक्षक हों या माता‑पिता—नेहरू के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। छोटा कदम उठाइए: एक किताब पढ़िए, एक सवाल पूछिए, और बच्चों के साथ एक नया प्रयोग कीजिए। इसी से विचारों की असली परख होती है।